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सिंगरौली कोयला ब्लॉक मामले में अडानी ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट से राहत, पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ याचिका खारिज

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में अडानी ग्रुप के कोयला ब्लॉक से जुड़े पर्यावरण मंजूरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नई याचिका खारिज कर दी.

मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में अडानी ग्रुप के कोयला ब्लॉक मामले में सुप्रीम कोर्ट से एक बार फिर राहत मिली है. कोर्ट ने प्रोजेक्ट के लिए दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ दायर नई याचिका को खारिज कर दिया है. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया है. लेकिन याचिकाकर्ता के आग्रह पर बाद में कोर्ट ने जुर्माने की राशि को वापस ले लिया. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इसपर और समय बर्बाद नही करना चाहते हैं.कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर कानूनी प्रक्रिया के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया है.

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि कृपया इस मामले में स्वतः संज्ञान लें. जुर्माना न लगाया जाए. वे एक पर्यावरणविद हैं जो पिछले 20 सालों से संघर्ष कर रहे है. इसपर कोर्ट ने कहा कि ठीक है, हम आपकी बात पर विचार करेंगे और जुर्माना नहीं लगाएंगे.

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा कि आप यहां दोबारा क्यों आए. इसपर याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि यह पर्यावरण से जुड़ा एक गंभीर मामला है, 1400 हेक्टेयर से जुड़ा हुआ है.कोर्ट ने कहा कि आपने एनजीटी के मुख्य फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी.

सिंगरौली में प्रस्तावित खनन परियोजना पर पर्यावरणीय चिंता

यह मामला मध्य प्रदेश के सिंगरौली वन क्षेत्र से जुड़ा है, जहां प्रस्तावित खनन क्षेत्र का एक हिस्सा हाथियों के कॉरिडोर में आने का दावा किया गया था. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया था कि यह बेहद गंभीर पर्यावरणीय मामला है और इसे सामान्य प्रतिद्वंद्वी मुकदमेबाजी की तरह नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा था कि करीब 6 लाख पेड़, जिनमें से कई पेड़ 500 साल से अधिक पुराने बताए जा रहें है, जो इस परियोजना के जद में है. याचिकाकर्ता ने कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत हस्तक्षेप कर वन स्वीकृतियों की वैधता की जांच की मांग करते हुए कहा था कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने याचिका को समयसीमा पार होने के आधार पर खारिज कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की शक्तियां एनजीटी अधिनियम से सीमित नहीं होती.

याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी कहा था कि सीमा निर्धारण की गणना आदेश जारी होने की तारीख से नहीं, बल्कि उसके संप्रेषित होने की तारीख से होनी चाहिए. उनके मुताबिक संबंधित आदेश केवल पर्यावरण मंत्रालय की वेबसाइट पर अपलोड किया गया था, जिसे विधिक रूप से उचित संप्रेषण नहीं माना जा सकता.

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 32 के तहत नई याचिका दायर करने की अनुमति मांगी जिसे कोर्ट ने देने से इनकार कर दिया था. यह याचिका पर्यावरणविद अजय दुबे ने दायर की थी. जिसमें मई 2025 में दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी गई थी. दायर याचिका में कहा गया था कि सिंगरौली के घने वन क्षेत्र में लगभग 1500 हेक्टेयर वन भूमि को कोयला खनन के लिए आवंटित किया गया, जबकि वन विभाग की पूर्व साइट सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार यह क्षेत्र प्रस्तावित ‘एलिफेंट कॉरिडोर’ में आता है.

नियमों के मुताबिक ऐसे कॉरिडोर की 10 किलोमीटर परिधि में खनन गतिविधियों की अनुमति दी जानी चाहिए. अप्रैल 2024 में गठित समिति ने स्थल का निरीक्षण कर कोयला उत्खनन के विरुद्ध अनुशंसा की थी. समिति ने कहा था कि यहां हाथियों सहित कई वन्यजीवों की नियमित आवाजाही होती है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि खनन गतिविधियों से वन्यजीव आवास को गंभीर क्षति पहुंचेगी.

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-भारत एक्सप्रेस



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