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दागी नेताओं पर आजीवन चुनाव बैन की मांग, सुप्रीम कोर्ट में जल्द होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट दागी जनप्रतिनिधियों पर आजीवन चुनाव बैन और लंबित आपराधिक केसों के जल्द निपटारे की याचिका पर शीघ्र सुनवाई करेगा. एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट के मुताबिक 40% सांसदों-विधायकों और 14 मुख्यमंत्रियों पर केस दर्ज हैं.

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Edited by Vaibhav Gupta

संसद और विधानसभाओं में बढ़ते अपराधीकरण पर लगाम कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा कदम उठाया है. शीर्ष अदालत ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के तेजी से निपटारे और दोषी साबित होने वाले जनप्रतिनिधियों पर आजीवन चुनाव लड़ने का प्रतिबंध (लाइफटाइम बैन) लगाने वाली याचिका पर जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने वरिष्ठ वकील और एमिकस क्यूरी (अदालत के मित्र) विजय हंसरिया की अपील पर यह सहमति जताई है.

776 में से 326 सांसदों पर आपराधिक मामले

सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी विजय हंसरिया ने चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश करते हुए बताया कि देश के लगभग 40 फीसदी जनप्रतिनिधियों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. संसद के 776 सदस्यों (लोकसभा और राज्यसभा) में से 326 सांसद दागी हैं. इनमें से 210 मामले तो अति गंभीर अपराधों से जुड़े हैं, जिनमें 5 साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है. रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में मौजूदा और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ कुल 4,192 आपराधिक केस पेंडिंग हैं.

14 मुख्यमंत्रियों पर मुकदमे

अदालत में सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक देश के 14 मुख्यमंत्रियों ने अपने ऊपर दर्ज आपराधिक केस घोषित किए हैं. इसमें तेलंगाना के मुख्यमंत्री अनुमुला रेवंत रेड्डी 89 मामलों के साथ सबसे आगे हैं. इसके अलावा पश्चिम बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी पर 29, कर्नाटक के डिप्टी सीएम डी. के. शिवकुमार और आंध्र प्रदेश के सीएम एन. चंद्रबाबू नायडू पर 19-19 मामले दर्ज हैं. रिपोर्ट में झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन पर 5, महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह पर 4-4, तथा पंजाब के सीएम भगवंत मान, राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा और ओडिशा के सीएम मोहन चरण माझी के खिलाफ 1-1 मामला दर्ज होने की बात कही गई है.

स्पेशल कोर्ट में चले रोज सुनवाई

एमिकस क्यूरी ने चिंता जताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स की लगातार निगरानी के बावजूद 2018 से लेकर अब तक लंबित मुकदमों की संख्या में कोई खास कमी नहीं आई है. उन्होंने सुझाव दिया कि इन मामलों के लिए अलग से स्पेशल कोर्ट बनाई जाएं और आरोप तय होने के एक साल के भीतर मुकदमे की सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाया जाए.

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-भारत एक्सप्रेस



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