Bharat Express DD Free Dish

Gen Z क्यों महसूस कर रही है सबसे ज्यादा तनाव? युवाओं के सवालों का जवाब तलाशती है ‘गीता’ पर आधारित यह नई किताब

आज की Gen Z पीढ़ी पहले से कहीं ज्यादा तनाव, असुरक्षा और मानसिक दबाव का सामना कर रही है.

आज की युवा पीढ़ी, जिसे आमतौर पर Gen Z कहा जाता है, पहले की पीढ़ियों की तुलना में अलग तरह की चुनौतियों का सामना कर रही है. सोशल मीडिया पर हर पल दूसरों की चमकदार जिंदगी देखना, बेहतर करियर बनाने की दौड़, बढ़ती महंगाई, नौकरी को लेकर असुरक्षा, रिश्तों में उलझन और हर समय मोबाइल स्क्रीन से जुड़े रहने की आदत ने युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है. यही वजह है कि दुनिया के कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि Gen Z में चिंता, तनाव और डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़े हैं. कई देशों में युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पहले की तुलना में लगभग दोगुनी दर्ज की गई हैं.

आज का युवा पहले से कहीं ज्यादा जुड़ा हुआ है, लेकिन अंदर से खुद को अकेला महसूस कर रहा है. सोशल मीडिया पर दूसरों की उपलब्धियां देखकर अक्सर अपनी जिंदगी कमतर लगने लगती है. हर समय कुछ हासिल करने का दबाव, लगातार खुद को बेहतर साबित करने की होड़ और भविष्य को लेकर अनिश्चितता कई युवाओं को इस सवाल तक ले आती है कि आखिर जीवन का असली उद्देश्य क्या है.

दिलचस्प बात यह है कि कई लोग मेडिटेशन ऐप, प्रोडक्टिविटी टूल और अलग-अलग सेल्फ-हेल्प तरीकों का इस्तेमाल भी कर रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्हें मन की शांति नहीं मिल पा रही. ऐसे माहौल में आध्यात्मिक सोच को आधुनिक जीवन से जोड़ने वाली किताबें युवाओं का ध्यान खींच रही हैं.

गीता के संदेश को आज की भाषा में समझाने की कोशिश

इसी संदर्भ में स्वामी नित्यानंद चरण दास की पुस्तक ‘गीता युवाओं के लिए’, जिसे पेंगुइन ने प्रकाशित किया है, चर्चा में है. इस किताब में भगवद्गीता के विचारों को सीधे आधुनिक शहरी जीवन की परिस्थितियों से जोड़कर समझाया गया है. ट्रैफिक जाम में फंसे रहने से लेकर देर रात तक मोबाइल स्क्रोल करने की आदत, जरूरत से ज्यादा सोचने की प्रवृत्ति और हर किसी को खुश रखने की कोशिश जैसे रोजमर्रा के अनुभवों के जरिए लेखक गीता के संदेश को सरल भाषा में प्रस्तुत करते हैं.

लेखक ISKCON चौपाटी, मुंबई से जुड़े साधु हैं और उनका प्रयास है कि युवा प्राचीन ज्ञान को सिर्फ धार्मिक ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने वाले व्यावहारिक मार्गदर्शन के रूप में समझें.

क्या खास है इस किताब में?

यह पुस्तक भगवद्गीता के 700 श्लोकों का सार सीधे कठिन दार्शनिक शैली में नहीं देती, बल्कि कहानियों, उदाहरणों और आत्मचिंतन से जुड़े अभ्यासों के माध्यम से समझाने की कोशिश करती है. इसका उद्देश्य युवाओं को यह बताना है कि गीता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की परेशानियों में भी उपयोगी हो सकती है.

किताब में निष्काम कर्म यानी परिणाम की चिंता छोड़कर अपने कर्तव्य पर ध्यान देने की बात को करियर और प्रतियोगिता के दबाव से जोड़ा गया है. इसके अलावा मन पर नियंत्रण, जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत से बाहर निकलना, सही मार्गदर्शन का महत्व, भक्ति और आत्मिक संतुलन जैसे विषयों को भी आधुनिक संदर्भों में समझाया गया है.

लेखक यह भी बताते हैं कि समर्पण को कमजोरी नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए. पुस्तक में आत्म-विकास के लिए कुछ व्यावहारिक मॉडल और चिंतन के तरीके भी शामिल किए गए हैं, जिन्हें युवा अपनी दिनचर्या में अपनाने की कोशिश कर सकते हैं.

आधुनिक जीवन और प्राचीन ज्ञान के बीच एक नई कड़ी

आज जब बड़ी संख्या में युवा “क्वार्टर-लाइफ क्राइसिस” और लगातार मानसिक दबाव का अनुभव कर रहे हैं, तब यह किताब उन्हें कुछ समय के लिए सोशल मीडिया की भागदौड़ से बाहर निकलकर खुद से जुड़ने का संदेश देती है. पुस्तक का मूल विचार यह है कि जैसे महाभारत का कुरुक्षेत्र संघर्षों का प्रतीक था, वैसे ही आज का जीवन भी अलग-अलग दुविधाओं से भरा हुआ है. ऐसे समय में गीता का संदेश संतुलन, अनुशासन और मानसिक शांति की दिशा में रास्ता दिखा सकता है.

ये भी पढ़ें- ‘दिल्ली में क्या होगा, वो दिल्ली पुलिस देखेगी!’ NEET-UG प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेने पर नैनीताल हाई कोर्ट ने उत्तराखंड पुलिस को लगाई फटकार

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read