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पृथ्वी से हजारों कोस दूर अनिल मेनन का कारनामा! ISS के बाहर 6:27 घंटे का मिशन किया पूरा, जानिए क्या होगा हासिल

पृथ्वी से स्पेसक्राफ्ट के जरिए उड़ान भरकर भारतीय मूल के एक एस्ट्रोनॉट डॉ. अनिल मेनन (Anil Menon) अंतरिक्ष में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) पहुंच गए. वहां उसने NASA की अंतरिक्ष यात्री जेसिका मीर के साथ 6 घंटे 27 मिनट तक सफलतापूर्वक ‘स्पेस वॉक’ (Spacewalk) किया.

ANIL MENON SPACEWALK HISTORIC FEAT

ISS के बाहर दो अंतरिक्ष यात्री

अंतरिक्ष में इंसानों की उड़ान के क्षेत्र में भारतीय प्रतिभा की झलक एक बार फिर दिखाई दी है. भारतीय मूल के अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री, NASA के एस्ट्रोनॉट डॉ. अनिल मेनन (Anil Menon) हाल ही अंतरिक्ष में गए. उन्‍होंने इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के बाहर 6 घंटे 27 मिनट तक कठिन और चुनौतीपूर्ण वातावरण में रहकर ‘स्पेस वॉक’ (Spacewalk) को सफलतापूर्वक पूरा किया.

यह मिशन अनिल मेनन ने NASA की अनुभवी अंतरिक्ष यात्री जेसिका मीर (Jessica Meir) के साथ 7 अगस्त की रात 12:30 बजे (भारतीय समयानुसार) शुरू कर सफलता पूर्वक संपन्न किया. यह अनिल मेनन की पहली स्पेस वॉक थी, जबकि जेसिका मीर के जीवन की यह छठी स्पेस वॉक रही.

क्यों खास और महत्वपूर्ण था यह स्‍पेस मिशन?

इस स्पेस वॉक का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी की कक्षा में लगातार घूम रहे अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के ‘3B पावर चैनल’ को भविष्य के बड़े अपग्रेड के लिए तैयार करना था.

6 घंटे 27 मिनट के इस ‘स्पेस वॉक’ के दौरान दोनों अंतरिक्ष यात्रियों ने स्पेस स्टेशन के बाहरी हिस्से में सोलर एरे (Solar Arrays) और पावर हार्डवेयर से जुड़े जटिल तकनीकी कार्यों को अंजाम दिया. इस अपग्रेडेशन के पूरा होने के बाद इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को अब पहले की तुलना में काफी अधिक और निरंतर सौर ऊर्जा (बिजली) उपलब्ध हो सकेगी, जिससे वहां चल रहे वैज्ञानिक प्रयोगों को बड़ी ताकत मिलेगी.

International Space Station

अब तक कितने भारतीय वैज्ञानिक स्‍पेस में गए?

अब तक कुल 7 भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के अंतरिक्ष यात्री स्पेस की यात्रा कर चुके हैं:

राकेश शर्मा (1984): भारत के पहले नागरिक और भारतीय वायु सेना के पायलट, जिन्होंने 3 अप्रैल 1984 को सोवियत संघ के ‘सोयुज टी-11’ (Soyuz T-11) मिशन के तहत अंतरिक्ष स्टेशन साल्युत-7 (Salyut 7) की यात्रा की.

कल्पना चावला (1997, 2003): भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री, जिन्होंने अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के ‘स्पेस शटल कोलंबिया’ (STS-87 और STS-107) के जरिए उड़ान भरी. (2003 में कोलंबिया हादसे में उनकी जान चली गई).

सुनीता विलियम्स (2006, 2012, 2024): भारतीय-अमेरिकी नासा एस्ट्रोनॉट, जिन्होंने नासा और बोइंग/स्पेसएक्स के सहयोग से कई लंबी अवधि के अभियानों में हिस्सा लिया और कई बार स्पेस वॉक का रिकॉर्ड बनाया.

राजा चारी (2021): भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक, जिन्होंने नासा और स्पेसएक्स (Crew-3) मिशन के तहत इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर 176 दिन बिताए.

सिरिशा बांदला (2021): भारत में जन्मी दूसरी महिला, जिन्होंने निजी एरोस्पेस कंपनी वर्जिन गैलेक्टिक (Virgin Galactic) के जरिए सब-ऑर्बिटल स्पेस टूरिज्म उड़ान भरी.

शुभांशु शुक्ला (2025): भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन, जो इसरो (ISRO), नासा और एक्जिऑम स्पेस (Axiom-4) मिशन के संयुक्त सहयोग से जून 2025 में ‘स्पेसएक्स ड्रैगन’ यान से ISS पर पहुंचे. वे राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष जाने वाले दूसरे भारतीय नागरिक बने.

अनिल मेनन (2026): नासा (NASA) के एस्ट्रोनॉट, जिन्होंने अमेरिकी मिशन के तहत अगस्त 2026 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) के बाहर अपनी पहली ऐतिहासिक स्पेस वॉक पूरी की.

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space work station

बीते 30 वर्षों में अंतरिक्ष यात्रियों की बड़ी खोजें

पिछले तीन दशकों (1996 से 2026) में इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और स्पेस शटल अभियानों पर वैज्ञानिकों ने शून्य गुरुत्वाकर्षण (Microgravity) में क्रांतिकारी शोध किए हैं:

मानव शरीर व चिकित्सा विज्ञान: माइक्रोग्रेविटी में हड्डियों के घनत्व में कमी (Bone Density Loss), मांसपेशियों के क्षरण और हृदय प्रणाली पर पड़ने वाले प्रभावों का गहरा अध्ययन हुआ. इसने पृथ्वी पर ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डी रोग) और कैंसर की नई दवाएं विकसित करने में मदद की.

बायोटेक और 3D टिशू प्रिंटिंग: अंतरिक्ष में बिना गुरुत्वाकर्षण के मानव अंगों (जैसे दिल के ऊतक और यकृत कोशिकाएं) को 3D प्रिंट करने और प्रोटीन क्रिस्टलाइजेशन पर अभूतपूर्व सफलता मिली.

अंतरिक्ष में कृषि और खाद्य उत्पादन: एस्ट्रोनॉट्स ने स्पेस स्टेशन में सरसों, मेथी, मूंग और विभिन्न सब्जियों व पौधों को उगाकर यह साबित किया कि भविष्य में लंबे अंतरिक्ष अभियानों के दौरान भोजन उगाना संभव है.

Material Science: अंतरिक्ष में मिश्र धातुओं (Alloys), सेमीकंडक्टर और तरल पदार्थों के व्यवहार पर शोध कर नई और मजबूत तकनीकें खोजी गईं.

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आने वाले 10 वर्षों (2026-2036) की परियोजनाएं

आर्टेमिस मिशन (Artemis Program): नासा अपने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर चंद्रमा की सतह पर फिर से इंसान को उतारेगा और वहां पहला स्थायी ‘लूनर बेस’ (Lunar Gateway Station) स्थापित करेगा.

मंगल ग्रह की मानव यात्रा (Human Mission to Mars): 2030 के दशक में इंसान को पहली बार मंगल ग्रह पर भेजने के लिए जीवन-रक्षा प्रणालियों और लंबी यात्राओं के लिए गहन शोध चल रहा है.

कमर्शियल स्पेस स्टेशन: 2030 तक ISS के सेवानिवृत्त होने के बाद नासा, एक्जिऑम स्पेस (Axiom Space) और ब्लू ओरिजिन जैसी निजी कंपनियां अपने व्यावसायिक स्पेस स्टेशन संचालित करेंगी.

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भारत का गगनयान और फ्यूचर का विजन (ISRO Plan)

भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में एक नया इतिहास रचने की दहलीज पर है:

गगनयान मिशन (Gaganyaan Mission): भारत स्वदेशी तकनीक से अपने अंतरिक्ष यात्रियों (गगनात्रियों) को 400 किमी की निचली पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में भेजेगा और उन्हें सुरक्षित वापस लाएगा.

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS – Bharatiya Antariksha Station): भारत वर्ष 2035 तक अपना खुद का ‘भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन’ स्थापित करने की योजना पर तेजी से काम कर रहा है.

चंद्रमा पर भारतीय (Lunar Mission by 2040): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के अनुसार, इसरो वर्ष 2040 तक किसी भारतीय नागरिक को चंद्रमा की सतह पर उतारने और वहां अपना बेस बनाने की दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है.

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