नई दिल्ली — यूनिवर्सिटी एक सार्वजनिक ट्रस्ट है। यह पारिवारिक कारोबार नहीं है। यह मुनाफ़े की मशीन नहीं है। यह किसी की निजी जागीर नहीं है।
यही साफ़-साफ़ संदेश भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2026 को अपने आदेश में आयशा जैन बनाम एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा एवं अन्य, [W.P. (C) No. 531/2025] में देश की हर प्राइवेट और डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी को दिया। अदालत ने कहा कि “किसी भी प्राइवेट यूनिवर्सिटी को मुनाफ़ा कमाने वाली संस्था की तरह चलाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी” और वित्त, दाख़िले, फ़ीस, स्टाफ़ और गवर्नेंस पर व्यापक ख़ुलासे के आदेश दिए।
लेकिन जबकि यह आदेश सभी प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटीज़ पर लागू होता है, शायद कोई संस्था ऐसी नहीं जहां इसके मायने जामिया हमदर्द से ज़्यादा गहरे न हों — दक्षिण दिल्ली की मशहूर डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी, जो NIRF 2025 में फ़ार्मेसी में लगातार सातवें साल नंबर 1 रही और जिसे NAAC A+ ग्रेड मिला है। छात्र, अभिभावक, फ़ैकल्टी और आम जनता अब एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं: अगर जामिया हमदर्द मुनाफ़ा कमाने वाली संस्था नहीं है, तो पैसा कहां जा रहा है? ख़राब प्रबंधन की क़ीमत स्टाफ़ और छात्र क्यों चुका रहे हैं? ग़ैरक़ानूनी क़ब्ज़ाधारियों को अब तक यूनिवर्सिटी पर कंट्रोल क्यों दिया गया, जिसने यूनिवर्सिटी को संकट में डाल दिया?
सरकारी ज़मीन, सरकारी पैसा — फ़ायदा किसका?
जामिया हमदर्द लगभग 92 एकड़ संस्थागत ज़मीन पर है, जो दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) ने 1989 में आवंटित की थी। यूनिवर्सिटी के अपने हिसाब से इसके निर्माण में क़रीब ₹500 करोड़ की सरकारी मदद लगी। ऑडिट इंस्पेक्शन रिपोर्ट सरकारी वित्तीय सहायता 2022-23 तक ₹433 करोड़ बताती है।
यह ज़मीन एक ही मक़सद के लिए दी गई थी: अकादमिक इस्तेमाल। DDA की लीज़ शर्तें साफ़ हैं — ज़मीन किसी और मक़सद के लिए किसी को नहीं दी जा सकती। ज़मीन या उसके किसी हिस्से को छोड़ने, सब-लीज़ करने या दूसरे मक़सद में लगाने से पहले सेक्शन 5 के तहत अनुमति और DDA की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
फिर भी, छात्रों, स्टाफ़ और कर्मचारियों की UGC और शिक्षा मंत्रालय से की गई शिकायतों में आरोप है कि यूनिवर्सिटी की जगह एक फ़ंडिंग एजेंसी — हमदर्द नेशनल फ़ाउंडेशन (HNF), एक प्राइवेट ट्रस्ट, जिसे यूनिवर्सिटी का प्रॉस्पेक्टस ख़ुद “संस्था चलाने वाला” बताता है — को मुफ़्त में दे दी गई है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि HNF यूनिवर्सिटी की बड़ी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किए हुए है, उसके लिए कुछ नहीं देता, और बड़े फ़ैसलों पर असर डालता है, जिससे यूनिवर्सिटी की आज़ादी, अकादमिक स्वायत्तता और संस्थागत ढांचा कमज़ोर हुआ है। दूसरी तरफ़, यूनिवर्सिटी एजेंसी के क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर भारी प्रॉपर्टी टैक्स चुका रही है।
सवाल: क्या DDA की अनुमति कभी मांगी गई? क्या कभी मिली? क्या UGC नियम स्पॉन्सरिंग/फ़ंडिंग एजेंसी को कोई सीधा या परोक्ष फ़ायदा देने की इजाज़त देते हैं?
वह सोसाइटी जिसे बदल दिया गया — सरकार की सहमति के बिना
स्पॉन्सरिंग बॉडी का कू: 46 सदस्यीय काउंसिल 19 में कैसे सिमट गई
जामिया हमदर्द को 10 मई 1989 को UGC एक्ट के सेक्शन 3 के तहत डीम्ड यूनिवर्सिटी घोषित किया गया था। जामिया हमदर्द सोसाइटी, स्पॉन्सरिंग सोसाइटी, 26 अप्रैल 1989 को सरकार से मंज़ूर एक व्यापक आधार वाली संस्था के तौर पर रजिस्टर हुई थी। उसके मूल मेमोरेंडम और नियमों में चेयरमैन, वाइस-चांसलर, सभी जीवित पूर्व वाइस-चांसलर, शिक्षा मंत्रालय, UGC, यूनानी-मेडिसिन रिसर्च काउंसिल और लेफ़्टिनेंट गवर्नर के नामज़द, दस नामी विद्वान, डीन, और तीन ग़ैर-शिक्षण स्टाफ़ प्रतिनिधि — कुल 46 से ज़्यादा सदस्य — का प्रावधान था।
उन नियमों का सेक्शन 40 साफ़ था: सोसाइटी की संरचना में कोई भी बदलाव सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के सेक्शन 12 और 12A के तहत होगा और “भारत सरकार की सहमति मिलने के बाद ही” लागू होगा।
| श्रेणी | 1989 (सरकार-मंज़ूर) | 2021 (बदला हुआ) |
| कुल वोटिंग सदस्य | लगभग 46* | 19 |
| स्कूल/सेंटर के डीन | 13* | 0 |
| पूर्व वाइस-चांसलर | 7* | 0 |
| स्वतंत्र नामी विद्वान | 10 | 2 (चांसलर के नामज़द) |
| ग़ैर-शिक्षण स्टाफ़ | 3 | 1 |
| फ़ाउंडेशन/स्पॉन्सरिंग बॉडी/कंपनी के नामज़द | 5 | 6 |
| संस्थागत नियंत्रण | व्यापक अकादमिक | 19 में से 12 बहुमत |
- डीन और पूर्व वाइस-चांसलर पदाधिकारियों के हिसाब से बदलते हैं
सोसाइटीज़ रजिस्ट्रार की मुहर लगी 2021 की प्रमाणित मेमोरेंडम प्रति सोसाइटी को सिर्फ़ 19 वोटिंग सदस्यों की तय संस्था के रूप में फिर से बनाती है। डीन ग़ायब। पूर्व वाइस-चांसलर ग़ायब। स्वतंत्र नामी विद्वान 10 से घटाकर 02 । चांसलर, उनके सीधे नामज़द, चार स्पॉन्सरिंग-बॉडी नामज़द (स्पॉन्सरिंग बॉडी के अंदर ही स्पॉन्सरिंग बॉडी का नामज़द — यह अपने आप में एक अजीब बात है) और एक प्राइवेट कंपनी के दो नामज़द अब 19 में से 12 सीटों पर हैं — साफ़ बहुमत, और बराबरी की सूरत में चेयरमैन के पास कास्टिंग वोट।
ऑडिट इंस्पेक्शन रिपोर्ट कहती है कि मेमोरेंडम को “सक्षम प्राधिकरण, यानी जामिया हमदर्द सोसाइटी, की मंज़ूरी लिए बिना” बदला गया, जो सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट का उल्लंघन है। शिक्षा मंत्रालय की 15 जनवरी 2025 की चिट्ठी पुष्टि करती है कि मंत्रालय के रिकॉर्ड के मुताबिक, “जामिया हमदर्द सोसाइटी के बारे में मंत्रालय ने कोई बदलाव नहीं किया है।”
सवाल: क्या मंत्रालय ने कभी वह सहमति दी जो सेक्शन 40 के लिए ज़रूरी थी? क्या सोसाइटी ने ख़ुद कभी बैठक करके इन बदलावों को मंज़ूर किया? मंत्रालय किस सोसाइटी को मान्यता देता है — 1989 की मूल संस्था को या कू के ज़रिए बनी 19 सदस्यीय संस्करण को?
ग़ैरक़ानूनी सिलसिला: सोसाइटी से चांसलर से वाइस-चांसलर तक
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि गवर्नेंस उल्लंघनों की एक चेन है, जिसकी हर कड़ी पिछली कड़ी पर टिकी है:
चेयरपर्सन बने चांसलर। आरोप है कि चांसलर की नियुक्ति ऐसी सोसाइटी ने की जो क़ानूनी तौर पर गठित ही नहीं थी — कोई बैठक, एजेंडा या प्रस्ताव उसके पीछे नहीं था — और फिर चेयरपर्सन ने ख़ुद को चांसलर बना लिया। UGC (Institutions Deemed to be Universities) Regulations, 2023 के Regulation 21(A)(1) के तहत स्पॉन्सरिंग बॉडी चांसलर नियुक्त कर सकती है, लेकिन सिर्फ़ तब जब संस्था का प्रबंधन, नियंत्रण या फ़ंडिंग केंद्र या राज्य सरकार द्वारा उसकी सालाना आमदनी के पचास प्रतिशत या ज़्यादा तक न हो। वरना नियुक्ति सरकार करती है। इतनी बड़ी सरकारी फ़ंडिंग को देखते हुए शिकायतकर्ता कहते हैं कि चांसलर नियुक्त करने का अधिकार स्पॉन्सरिंग बॉडी के पास ही नहीं हो सकता।
चार एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल सदस्य स्पॉन्सरिंग सोसाइटी की सहमति के बिना रखे गए — यूनिवर्सिटी की प्रमुख गवर्निंग बॉडी में। 10 अक्टूबर 2023 की एक चिट्ठी, जिस पर “चेयरमैन, जामिया हमदर्द सोसाइटी” के हस्ताक्षर थे, ने 2023 Regulations के Section 11(5)(h) के तहत चार प्रोफ़ेसरों को एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल में नामज़द किया। इसमें सोसाइटी के किसी प्रस्ताव का ज़िक्र नहीं है। तत्कालीन वाइस-चांसलर ने उसी दिन हस्ताक्षर करके हाथ से लिखा कि नोटिफ़िकेशन जारी कर दिया जाए। शिकायतकर्ता कहते हैं कि न सोसाइटी की बैठक हुई, न एजेंडा, न मिनट्स, न प्रस्ताव। चिंता संरचनात्मक है: जो सदस्य अपनी सीट किसी एक व्यक्ति के एहसान पर पाते हैं, न कि उस सोसाइटी के चुनाव पर जिसने उन्हें सामूहिक रूप से चुना हो, वे यूनिवर्सिटी की सर्वोच्च गवर्निंग बॉडी में बैठते हैं।
2021 में VC चुनने वाली पैनल ने UGC मानदंड तोड़े; 2026 की प्रक्रिया पर नई आपत्तियां
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि जिस सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी ने 2021 में प्रोफ़ेसर अफ़शार आलम को जामिया हमदर्द का वाइस-चांसलर बनने की सिफ़ारिश की थी, वह UGC Regulations, 2018 के Clause 7.3 के मुताबिक़ गठित नहीं थी। उनकी शिकायतें अब UGC और शिक्षा मंत्रालय (MoE) के पास हैं।
कमेटी की संरचना पर आरोप: नियमों के मुताबिक़ ऐसी कमेटी के सदस्य उच्च शिक्षा के नामी लोग होने चाहिए जो संबंधित यूनिवर्सिटी से किसी भी तरह जुड़े न हों। 2021 की कमेटी की अध्यक्षता प्रोफ़ेसर इक़बाल हस्नैन ने की थी, जो उसी यूनिवर्सिटी के प्रो-चांसलर थे। शिकायतकर्ताओं की राय में, ऐसे व्यक्ति की अध्यक्षता वाली पैनल में वह स्वतंत्रता और निष्पक्षता नहीं है जो नियमों में वैध चयन की पूर्व शर्त है।
उम्मीदवार की ईमानदारी पर आरोप: शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मामला सिर्फ़ संरचना तक सीमित नहीं है। Clause 7.3 के मुताबिक़ वाइस-चांसलर को उच्च कोटि का शिक्षाविद होना चाहिए, जिसके पास सर्वोच्च स्तर की क्षमता, ईमानदारी, नैतिकता और संस्थागत प्रतिबद्धता हो। उनका कहना है कि चयन के वक़्त प्रोफ़ेसर आलम को यूनिवर्सिटी के अपने बोर्ड ऑफ़ मैनेजमेंट ने CBI की सिफ़ारिश पर मेजर/माइनर पानल्टी दी थी। फिर भी उनका नाम ऐसे चेयरपर्सन ने क्लियर किया जो ख़ुद यूनिवर्सिटी से जुड़ा था, यानी जिस बॉडी ने पहले उनके ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया था, उसे असल में एक ऐसी कमेटी ने ओवरराइड कर दिया जिसमें स्वतंत्रता ही नहीं थी। शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि इन हालात से गंभीर सवाल उठता है कि Clause 7.3 की ईमानदारी की शर्त कभी परखी गई या नहीं, पूरी हुई तो दूर की बात है। उनका कहना है कि शुरुआत में ही एक अयोग्य अध्यक्ष के चलते समझौता हुआ और उम्मीदवार के ख़िलाफ़ दर्ज पेनाल्टी को नज़रअंदाज़ करने वाली चयन प्रक्रिया टिक नहीं सकती।
2026 की प्रक्रिया पर आपत्तियां: शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि मौजूदा दौर में भी वही अनियमितताएं दोहराने की कोशिश की गई। उनका कहना है कि 11 जून 2026 और 22 जुलाई 2026 की एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल बैठकों में, जो अगले वाइस-चांसलर के लिए सर्च-कम-सिलेक्शन कमेटी में EC नामज़द चुनने के लिए बुलाई गई थीं, जिन्हें कार्रवाई का अधिकार नहीं था, उन्होंने कार्यवाहक वाइस-चांसलर और “पुरानी टीम” के ज़रिए वही ग़ैरक़ानूनी काम दोहराने की कोशिश की। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक़, रजिस्ट्रार और UGC के नामज़द ने उन बैठकों में लागू नियमों का हवाला देते हुए गंभीर आपत्तियां उठाईं और कथित ग़ैरक़ानूनी काम की जानकारी UGC को लिखित में दी। बताया जाता है कि प्रोफ़ेसर आलम अब भी इस पद के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं। अब सबकी नज़रें इस पर हैं कि UGC और MoE शिकायतों पर क्या कार्रवाई करते हैं।
22 जुलाई 2026 का फ़ैसला पलटा। 22 जुलाई 2026 को 73वीं (आपात) एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल बैठक में मौजूद ग्यारह में से नौ सदस्यों ने सर्च कमेटी में एक नामज़द को नामित करने के पक्ष में वोट दिया। कार्यवाहक वाइस-चांसलर, जो अध्यक्षता कर रहे थे, फ़ोन कॉल के लिए बाहर गए, वापस आए और कहा कि चांसलर ऑफ़िस सहमत नहीं है। UGC के ख़ुद के नामज़द ने 23 जुलाई 2026 को लिखा कि कार्यवाहक VC प्रोफ़ेसर असग़र अली को बहुमत के फ़ैसले को रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है, कास्टिंग वोट सिर्फ़ बराबरी में आता है, और मिनट्स को “एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल की पवित्रता बनाए रखते हुए” ठीक किया जाना चाहिए।
14 अगस्त 2026 की बैठक। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि प्रोफ़ेसर असग़र अली, जो कार्यवाहक वाइस-चांसलर के तौर पर काम कर रहे थे, 8 अगस्त 2026 को 65 साल के हो गए और लागू उम्र सीमा के तहत उसी तारीख़ से उस पद से मुक्त माने जाते हैं। उनका कहना है कि फिर भी उन्होंने 14 अगस्त की एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल बैठक बुलाई और अध्यक्षता की, यानी अपने पद से मुक्त माने जाने के छह दिन बाद। उस बैठक में 22 जुलाई के फ़ैसले को पलट दिया गया। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, प्रोफ़ेसर अली को बैठक बुलाने या अध्यक्षता करने का कोई अधिकार नहीं था, और इसलिए वहां पारित प्रस्ताव चुनौती के दायरे में हैं।
चेन साफ़ है: सोसाइटी बदली गई बिना उसकी ख़ुद की और सरकार की मंज़ूरी के, फिर एक चेयरमैन की चिट्ठी में नामज़द आए, फिर वह एग्ज़ीक्यूटिव काउंसिल जो वाइस-चांसलर चुनने में मदद करती है, फिर वह वाइस-चांसलर जो यूनिवर्सिटी चलाता है। अगर पहली कड़ी ही ग़लत है, तो उस पर खड़ी हर चीज़ को चुनौती दी जा सकती है।
वह फ़ंडिंग एजेंसी जिसने लिया, दिया कुछ नहीं
शिकायतकर्ता कहते हैं कि फ़ंडिंग एजेंसी के दान मामूली रहे — कुछ मामलों में तो नगण्य — फिर भी उन्हें मालिकाने के दावे की तरह पेश किया गया। यूनिवर्सिटी को नुक़सान, उनके मुताबिक़, दान से कहीं ज़्यादा रहा:
• ज़मीन: एजेंसी यूनिवर्सिटी की बड़ी ज़मीन पर क़ब्ज़ा किए हुए है।
• आज़ादी: उसने बड़े फ़ैसलों पर असर डाला और यूनिवर्सिटी की स्वतंत्रता और गवर्नेंस कमज़ोर की, जिससे यूनिवर्सिटी गंभीर नतीजों की तरफ़ बढ़ी।
• प्रॉपर्टी टैक्स: एजेंसी के क़ब्ज़े वाली ज़मीन पर यूनिवर्सिटी भारी प्रॉपर्टी टैक्स चुका रही है।
• ठेके और नुक़सान: ठेके सीधे दिए गए, और यूनिवर्सिटी को ख़राब प्रबंधन और दख़ल के चलते बड़े वित्तीय नुक़सान हुए।
• टैक्स छूट: फ़ंडिंग एजेंसी यूनिवर्सिटी के नाम पर टैक्स छूट लेती है, लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि पैसा पूरा यूनिवर्सिटी तक नहीं पहुंचता।
मामला ऊपरी अधिकारियों तक पहुंचाया गया है। शिकायतकर्ताओं ने सरकार से फ़ंडिंग एजेंसी की फ़ंडिंग और छूट की पड़ताल करने को कहा है।
सवाल: फ़ंडिंग एजेंसी यूनिवर्सिटी के नाम पर करोड़ों की टैक्स छूट लेती है। वह पैसा कहां जाता है? अगर वह यूनिवर्सिटी तक नहीं पहुंचता, तो छूट का फ़ायदा ही क्या?
जामिया हमदर्द में ख़राब प्रबंधन और गवर्नेंस संकट: जिसकी क़ीमत छात्र और देश चुका रहे हैं
जामिया हमदर्द में गवर्नेंस संकट की क़ीमत अब कैंपस से बाहर तक पहुंच चुकी है। जुलाई 2025 में, जामिया हमदर्द के हमदर्द इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च (HIMSR) में 150 MBBS सीटें ख़राब प्रबंधन और गवर्नेंस संकट के चलते चली गईं। यह इनकार जामिया हमदर्द (डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी) और HIMSR के बीच प्रशासनिक, वित्तीय और गवर्नेंस विवाद के बाद हुआ। यूनिवर्सिटी ने कथित वित्तीय अनियमितताओं और नेतृत्व की गतिरोध का हवाला देते हुए अपनी अनिवार्य Consent of Affiliation (CoA) वापस ले ली थी।
नुक़सान किसका: शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सीटें लापरवाही, ख़राब प्रबंधन और उन लोगों के ग़ैरज़रूरी दख़ल के चलते गईं, जिन्हें वे यूनिवर्सिटी के दफ़्तरों पर ग़ैरक़ानूनी क़ब्ज़ाधारी बताते हैं, जो फ़ंडिंग एजेंसी की तरफ़ से काम करते हैं। इसका नुक़सान सबसे पहले योग्य छात्रों और उनके अभिभावकों को हुआ, और इससे देश को उस वक़्त मेडिकल सीटों से महरूम होना पड़ा जब उनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हालात ऐसे ही चलते रहे, तो नतीजे और भी गंभीर होंगे।
नियम क्या कहते हैं: शिकायतकर्ताओं का कहना है कि भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार नियम और दिशानिर्देश जारी और संशोधित किए हैं ताकि एक निष्पक्ष और पारदर्शी व्यवस्था बनी रहे। इनका मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी फ़ंडिंग या स्पॉन्सरिंग बॉडी उस संस्था पर बेवजह फ़ायदा या कंट्रोल न पा ले जिसे वह सपोर्ट करती है। उनके शब्दों में, यूनिवर्सिटी की एक इंच ज़मीन या संपत्ति भी ऐसी बॉडी के कंट्रोल में नहीं आनी चाहिए, क्योंकि यही अलगाव व्यवस्था को पारदर्शी रखता है। उनकी राय में, कंट्रोल की चल रही खींचतान इसी सिद्धांत के ख़िलाफ़ है, और मेडिकल सीटें इसकी पहली क़ुर्बानी बनीं।
वे क्या चाहते हैं: शिकायतकर्ताओं का कहना है कि अब इस मामले को UGC, शिक्षा मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट को गंभीरता से उठाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर उन लोगों को हटा दिया जाए जो उनके मुताबिक़ यूनिवर्सिटी पर ग़ैरक़ानूनी कंट्रोल कर रहे हैं, तो समस्या जल्दी हल हो सकती है। तब तक, उनके मुताबिक़, संस्थागत स्थिरता हासिल नहीं हो सकती।
जवाबदेही का तूफ़ान: हर जगह शिकायतें
जामिया हमदर्द के परिवारों और टॉप मैनेजमेंट की क़ानूनी मुश्किलें किसी एक मंच तक सीमित नहीं हैं। शिकायतें यहां दर्ज कराई गई हैं:
• CBI: “जामिया हमदर्द एम्प्लॉइज़” कहलाने वाले एक समूह ने UGC से अपील की है कि पूर्व वाइस-चांसलर डॉ अफ़शार आलम के कार्यकाल में हुई कथित प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं की CBI जांच कराई जाए। चिट्ठी में नियुक्तियों में अनियमितता का आरोप है, यह कहा गया है कि पूर्व वाइस-चांसलर के रिश्तेदारों और नज़दीकियों को कई पदों पर बैठाया गया, और ख़ास तौर पर तौहीद आलम की असिस्टेंट रजिस्ट्रार और PRO के तौर पर नियुक्ति पर सवाल उठाया गया है, यह कहते हुए कि वे डॉ अफ़शार आलम के परिवार से संबंधित हैं। डॉ अफ़शार आलम के ख़िलाफ़ चेन्नई, तमिलनाडु के CBI ऑफ़िस में पहले से जांच लंबित है, केस नंबर RC.MAI: 2009.A.0056, जिसमें भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधान लगाए गए हैं।
• प्रवर्तन निदेशालय (ED): वित्तीय अनियमितताओं और फ़ंड की हेराफेरी की शिकायतें।
• आर्थिक अपराध शाखा (EOW): आर्थिक अपराधों की शिकायतें।
• भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI): वित्तीय लेन-देन की शिकायतें।
• UGC और शिक्षा मंत्रालय: गवर्नेंस और प्रशासनिक उल्लंघनों की शिकायतें।
• हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट: कई याचिकाएँ और कार्यवाहियाँ।
• रजिस्ट्रार ऑफ़ सोसाइटीज़: सोसाइटी के मेमोरेंडम में बदलाव की शिकायतें।
कर्मचारियों ने एक और अहम मुद्दा उठाया है: यूनिवर्सिटी के वित्त से जुड़े काम KPMG और फिर Deloitte को आउटसोर्स किए जाने का मामला। उनका आरोप है कि इस क़दम का असर प्रशासनिक नियंत्रण और यूनिवर्सिटी की वित्तीय स्थिति पर पड़ा है। शिकायतकर्ता यह भी आरोप लगाते हैं कि दाख़िले की प्रक्रिया Deloitte को सौंप दी गई है, जिसमें न Controller of Examinations, न Registrar, न Vice-Chancellor का कोई नियंत्रण है। कुल मिलाकर, ग़ैरक़ानूनी दावेदारों द्वारा यूनिवर्सिटी को कंट्रोल करने और क़ब्ज़ा करने की एक गहरी साज़िश पर शक है। छात्रों का डेटा — जो डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत संवेदनशील मामला है — कथित तौर पर एक तीसरे पक्ष के हाथ में है, जो यूनिवर्सिटी को गंभीर ख़तरे में डाल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश में क्या मांगा गया — और जामिया हमदर्द के लिए इसका क्या मतलब
सुप्रीम कोर्ट का 17 सितंबर 2026 का आदेश सिर्फ़ सिद्धांत का बयान नहीं है। यह विस्तृत, लागू करने योग्य निर्देशों का सेट है, जिसका हर प्राइवेट और डीम्ड यूनिवर्सिटी को पालन करना होगा। अदालत ने निर्देश दिए:
1. वित्तीय ख़ुलासे: पिछले पांच साल की ऑडिटेड रिपोर्ट, जिसमें यूनिवर्सिटी द्वारा जुटाए गए फ़ंड और उनके इस्तेमाल का पूरा ब्यौरा; ऐसे व्यक्तियों को किए गए भुगतान जो यूनिवर्सिटी के शैक्षणिक कामकाज में सीधे शामिल या संबंधित नहीं हैं; और केंद्र या राज्य सरकारों से मिले फ़ायदे, जिनमें ज़मीन आवंटन और छूट शामिल हैं।
2. दाख़िले, इम्तिहान और फ़ीस वसूली: हर कोर्स में छात्रों के दाख़िले की असल प्रक्रिया, जिसमें यह भी कि दाख़िले का ज़िम्मा किसके पास है, पेपर कौन बनाता है, इम्तिहान कौन कराता है, कॉपियां कौन जांचता है, फ़ंड कौन संभालता है, और इन सबमें मैनेजमेंट की क्या भूमिका है।
3. सरप्लस फ़ंड का इस्तेमाल: सरप्लस फ़ंड का क्या किया जाता है, जिसमें उनसे किए गए निवेश भी शामिल हैं।
4. शिक्षण और ग़ैर-शिक्षण स्टाफ़: भर्ती का तरीक़ा, वेतन, अन्य भुगतान, सेवा शर्तें, जनवरी 2025 से हर शिक्षक को आवंटित क्लास और असल में ली गई क्लास, और शिक्षक के उपलब्ध न होने पर छात्रों को नुक़सान से बचाने के लिए किए गए वैकल्पिक इंतज़ाम।
5. शिकायत निवारण: पिछले तीन साल में शिकायत निवारण तंत्र का ब्यौरा, जिसमें कमेटी की संरचना, किस तरह की शिकायतें ली जा सकती हैं, प्राप्त शिकायतों की संख्या और ब्यौरा, उनका नतीजा और हल में लगा समय शामिल है।
6. संबद्धता देने वाली संस्थाओं के लिए निर्देश: मान्यता/संबद्धता के लिए की गई जांचों का ब्यौरा, जिसमें उस फ़ैकल्टी और सहायक स्टाफ़ का ब्यौरा भी शामिल है जिसके आधार पर मान्यता या संबद्धता दी गई। संबंधित नियामक संस्थाओं को यह भी बताना है कि पिछली जांच में कौन-कौन सी कमियां बताई गईं और क्या वे दूर हुईं। इन संस्थाओं/निकायों को अपने जवाब चेयरमैन/प्रेसिडेंट/चीफ़ एग्ज़ीक्यूटिव ऑफ़िसर/चीफ़ कंट्रोलिंग ऑफ़िसर द्वारा शपथ-पत्र पर दाख़िल करने होंगे।
7. केंद्र/राज्य सरकारों के लिए निर्देश: भारत संघ/संबंधित राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकारों को यूनिवर्सिटीज़ और कॉलेजों से यह जानकारी लेनी होगी और छह हफ़्ते के अंदर अपने मुख्य सचिवों द्वारा व्यक्तिगत रूप से शपथ-पत्र पर हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल करना होगा।
अदालत ने साफ़ किया कि राज्य के पास यह शक्ति है — जिसमें यूनिवर्सिटीज़ के ख़िलाफ़ दबाव के उपाय भी शामिल हैं — कि तय जानकारी रिकॉर्ड पर लाई जाए।
आगे की राह: छात्रों के लिए उम्मीद, मालिकों के लिए चेतावनी
शिक्षा मंत्रालय और UGC ने शिकायतों का संज्ञान लिया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर अनियमितताओं की जांच के लिए जल्द एक हाई-पावर जांच आयोग आने की उम्मीद है। सूत्र बताते हैं कि सरकार ख़ास तौर पर ऐसी जगहों पर कम से कम फ़ीस पर उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा सुनिश्चित करने को लेकर गंभीर है जहां ज़मीन और इमारतें सरकार की हैं — और जामिया हमदर्द का मामला पूरे सेक्टर में सुधार का टेम्पलेट बन सकता है।
UGC के ख़ुद के नियम वह मानक तय करते हैं जिस पर अब जामिया हमदर्द को खरा उतरना है:
• Regulation 11: डीम्ड यूनिवर्सिटी की सभी चल और अचल संपत्ति का इस्तेमाल शैक्षणिक गतिविधियों, रिसर्च और उससे जुड़े प्रशासन के लिए होगा।
• Regulation 31: यूनिवर्सिटी के खाते यूनिवर्सिटी के अपने नाम पर रखे जाएं, स्पॉन्सरिंग बॉडी के नाम पर नहीं, और फ़ंड स्पॉन्सरिंग बॉडी या किसी और निकाय को नहीं भेजे जाएं।
• Regulation 24: किसी भी रूप में दान या कैपिटेशन फ़ीस मना है, और फ़ीस ग़ैर-मुनाफ़ाख़ोरी को ध्यान में रखते हुए पारदर्शी तरीक़े से तय होनी चाहिए।
जामिया हमदर्द के लिए कसौटी सीधी है: हर जगह और हर रुपया यूनिवर्सिटी के काम आए, किसी बाहरी एजेंसी के नहीं।
बड़ा सवाल: यूनिवर्सिटी का मालिक कौन?
जामिया हमदर्द के संस्थापक हकीम अब्दुल हमीद एक ऐसे चिकित्सक थे जिन्होंने सबसे ग़रीब लोगों की सेवा की। उन्होंने दशकों में शैक्षणिक संस्थानों का एक परिसर खड़ा किया, जिसे मई 1989 में मिलाकर एक डीम्ड यूनिवर्सिटी बना दिया गया। उनका सपना था कि अल्पसंख्यक समुदाय आगे बढ़े और भारत को आगे बढ़ाने में मदद करे।
सर सैयद अहमद ख़ान ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाई। क्या उनके वंशज AMU पर मालिकाना दावा करते हैं? नहीं। जामिया मिलिया इस्लामिया सामुदायिक ज़मीन पर सबने मिलकर बनाई और कोई मालिकाना दावा नहीं करता। फिर जामिया हमदर्द अलग क्यों हो? हकीम साहब के वंशज DDA की ज़मीन और सरकारी पब्लिक फ़ंडिंग से बने जामिया हमदर्द पर मालिकाना दावा क्यों कर रहे हैं?
दानदाता मालिक नहीं होता
सुप्रीम कोर्ट ने अब यह सिद्धांत साफ़ कर दिया है: जो यूनिवर्सिटी को फ़ंड या स्पॉन्सर करते हैं, वे दानदाता हैं, मालिक नहीं। किसी सार्वजनिक संस्था को किसी दानदाता की निजी संपत्ति की तरह नहीं समझा जा सकता, और किसी सार्वजनिक ट्रस्ट को पारिवारिक जागीर नहीं बनाया जा सकता।
छात्रों के लिए — वे ₹10 लाख, ₹12 लाख और ₹15 लाख फ़ीस देते हैं उन कोर्सों के लिए जो संस्था के पीछे लगी सरकारी ज़मीन और फ़ंडिंग को देखते हुए कहीं ज़्यादा किफ़ायती होने चाहिए। उनके लिए अदालत का आदेश उम्मीद की किरण है।
फ़ैकल्टी और स्टाफ़ के लिए — वे अपारदर्शी भर्ती, अनिश्चित सेवा शर्तों और ऐसे गवर्नेंस ढांचे के साथ जी रहे हैं जो किसी को जवाब नहीं देता। उनके लिए यह आदेश जवाबदेही का वादा लेकर आया है।
आम जनता के लिए — उनकी ज़मीन और पैसे से यह संस्था बनी। उनके लिए यह आदेश पारदर्शिता की बहुत देर से आई मांग है।
सुप्रीम कोर्ट बोल चुका है। मंत्रालय और UGC हरकत में हैं। अब सवाल यह है: जामिया हमदर्द का मैनेजमेंट पालन करेगा, या सार्वजनिक यूनिवर्सिटी को पारिवारिक कारोबार की तरह चलाता रहेगा?
इसका जवाब सिर्फ़ एक संस्था का भविष्य तय नहीं करेगा, बल्कि भारत में उच्च शिक्षा की तक़दीर तय करेगा।
— भारत एक्सप्रेस
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