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विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार




भारत एक्सप्रेस


30 जनवरी को शहीद दिवस पर रखा जाने वाला दो मिनट का मौन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि आज़ादी के लिए बलिदान देने वाले शहीदों को सामूहिक श्रद्धांजलि है. जानिए कैसे फील्ड मार्शल के.एम. कारियप्पा के सुझाव और पंडित नेहरू की पहल से इस राष्ट्रीय परंपरा की शुरुआत हुई.

77वें गणतंत्र दिवस पर वाणी प्रकाशन की पुस्तक “हम भारत के लोग : भारतीय संविधान पर नौ निबंध” संविधान के मूल आदर्शों, संस्थागत ढांचे और उसकी आज की प्रासंगिकता पर सोचने को मजबूर करती है.

26 साल की उम्र में किरण बेदी ने लिंगभेद के खिलाफ खड़े होकर इतिहास रच दिया. 26 जनवरी 1975 को उन्होंने गणतंत्र दिवस परेड में दिल्ली पुलिस की पूरी पुरुष टुकड़ी का नेतृत्व किया और साबित कर दिया कि नेतृत्व जेंडर नहीं, हौसले से तय होता है.

साधारण बस कंडक्टर से ‘अक्षर योगी’ बने एनके गौड़ा की प्रेरक यात्रा बताती है कि जुनून और त्याग से ज्ञान का ऐसा खजाना खड़ा किया जा सकता है, जो समाज और आने वाली पीढ़ियों को रोशन करे.

भारत के लिए प्रिय विदेशी पत्रकार सर मार्क टली का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया. बीबीसी के भारत ब्यूरो चीफ रहे टली ने ऑपरेशन ब्लू स्टार, आपातकाल और बाबरी मस्जिद विध्वंस जैसी घटनाओं को कवर किया और अपनी विनम्रता, सत्यनिष्ठा और भारत प्रेम से लोगों के दिलों में जगह बनाई.

विजय सिंह की पुस्तक "साठ पार के सुपरस्टार" रिटायरमेंट के बाद सक्रिय और सकारात्मक जीवन जीने का मंत्र देती है. अखबार बेचने से लेकर नेशनल सेल्स हेड तक का सफर तय करने वाले लेखक ने अपनी इस किताब में बताया है कि कैसे 60 के बाद की 'बोनस उम्र' को एक सुपरस्टार की तरह जिया जा सकता है.

24 जनवरी 1966 को एक विमान हादसे में भारत ने अपने 'न्यूक्लियर प्रोग्राम के जनक' होमी जहांगीर भाभा को खो दिया था. 117 लोगों की जान लेने वाले इस हादसे को आज भी कई लोग एक सोची-समझी साजिश मानते हैं.

आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन पर उनकी वीरता के साथ याद की जा रही है उनकी गहरी प्रेम-कहानी. पुस्तक "सुभाष-एमिली: अधूरे प्रेम की पूरी कहानी" में उकेरा गया है 1934 में वियना से शुरू हुआ सुभाष-एमिली शेंकल का रिश्ता.

चुनाव कभी नहीं लड़े, कोई पद नहीं संभाला, फिर भी दशकों तक सत्ता की धुरी बने रहे. बालासाहेब ठाकरे सत्ता के नहीं, सोच और सिंहगर्जना के सम्राट थे.

19 जनवरी 1966 का दिन भारतीय लोकतंत्र के लिए एक क्रांतिकारी मोड़ था. लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद उपजे राजनीतिक शून्य को भरने के लिए कांग्रेस के भीतर पहली बार गुप्त मतदान के जरिए चुनावी जंग हुई. एक तरफ अनुभवी मोरारजी देसाई थे, तो दूसरी तरफ नेहरू की विरासत संभाल रहीं इंदिरा गांधी.