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मोटापा बना कंपनियों की लॉटरी! ‘फैट बर्न’ के नाम पर गोली से फुट पैच तक बाजार में अरबों की कमाई

वजन घटाने के नाम पर पिल्स, डिटॉक्स ड्रिंक्स से लेकर फुट पैच तक का बाजार करोड़ों की कमाई कर रहा है. ‘नो डाइट, नो एक्सरसाइज’ जैसे दावों के बीच ASCI, CCPA और अमेरिकी FDA की कार्रवाइयों ने इन भ्रामक विज्ञापनों और फर्जी दावों की पोल खोल दी है. जानिए क्या है इस फैट बर्न इंडस्ट्री का पूरा सच.

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वजन घटाने वाले भ्रामक विज्ञापन

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

वजन बढ़ना आज करोड़ों लोगों की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है, और इसी चिंता ने एक ऐसे विशाल बाजार को जन्म दिया है जहां चर्बी घटाने के नाम पर तरह-तरह के उत्पाद बेचे जा रहे हैं. कोई गोली खाने से वजन कम करने का दावा कर रहा है, कोई पाउडर से मेटाबॉलिज्म तेज करने का भरोसा दे रहा है, तो कोई फुट पैच को रातभर पैरों पर चिपकाकर सोने भर से फैट बर्न होने का दावा करता है.

सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने इस कारोबार को और आसान बना दिया है. ‘नो डाइट, नो एक्सरसाइज’, ‘कुछ ही हफ्तों में मनचाही बॉडी’ जैसे लुभावने विज्ञापनों से उपभोक्ताओं को आकर्षित किया जाता है. लेकिन इन दावों के पीछे सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इनके पास कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण है?

ASCI की रडार पर भ्रामक दावे

विज्ञापन निगरानी संस्था ASCI (Advertising Standards Council of India) ने हाल ही में एक वेट लॉस पाउडर के विज्ञापन पर कार्रवाई की. विज्ञापन में ‘90 दिनों में ड्रीम बॉडी’ और ‘फैट बर्न’ जैसे दावे किए गए थे. ASCI के मुताबिक, कंपनी इन दावों के समर्थन में कोई स्वतंत्र क्लिनिकल रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी. विज्ञापन में 0, 45 और 90 दिनों के विजुअल से यह भ्रम फैलाया गया कि सिर्फ उत्पाद के इस्तेमाल से बड़ा वजन कम किया जा सकता है. ASCI ने इसे भ्रामक मानते हुए शिकायत को बरकरार रखा.

इस जांच के घेरे में सिर्फ छोटे-मोटे ब्रांड ही नहीं, बल्कि बड़े नाम भी शामिल हैं. ASCI के एक अन्य मामले में Horlicks Pro Fitness के इंस्टाग्राम विज्ञापन में ‘एक महीने में 2 किलो तक वजन कम’ करने का संदेश दिया गया था. कंपनी ने इसे कैलोरी डेफिसिट के वैज्ञानिक आधार के साथ समझाया, लेकिन विज्ञापन में जरूरी डिस्क्लेमर न होने पर ASCI ने आपत्ति जताई. हालांकि, पर्याप्त प्रमाणों के आधार पर मुख्य दावे को स्वीकार किया गया. यह मामला दर्शाता है कि दावा सही हो सकता है, लेकिन उसे किस शर्तों के साथ उपभोक्ता के सामने रखा जा रहा है, यह बेहद महत्वपूर्ण है.

‘डिटॉक्स’ और ‘फैट बर्न’ का खेल

अब बाजार में वजन घटाने का नया जरिया ‘फुट पैच’ को बताया जा रहा है. दावा किया जाता है कि रात में पैरों के तलवों पर पैच लगाकर सोने से शरीर डिटॉक्स होता है और फैट बर्न होता है. सुबह पैच का रंग काला या गहरा होने पर उपभोक्ता को यह विश्वास दिलाया जाता है कि शरीर से टॉक्सिन्स (विषैले पदार्थ) बाहर निकल गए हैं.

हालांकि, जानकारों और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, पैच का रंग बदलना किसी रासायनिक प्रतिक्रिया का नतीजा हो सकता है, शरीर से टॉक्सिन निकलने का सबूत नहीं. पैर के तलवे पर चिपकाया गया पैच शरीर के अंदर जमा फैट को किस प्रक्रिया से जलाएगा, इसका कोई प्रामाणिक वैज्ञानिक आधार मौजूद नहीं है.

फुट पैच के अलावा स्लिमिंग पिल्स, हर्बल कैप्सूल और डिटॉक्स ड्रिंक्स की भी भरमार है. अक्सर उपभोक्ता ‘हर्बल’, ‘नेचुरल’ या ‘आयुर्वेदिक’ लिखे उत्पादों को बिना सोचे-समझे सुरक्षित मान लेते हैं. अमेरिकी एफडीए (FDA) भी चेतावनी देता है कि ‘नेचुरल’ लिखा होना उत्पाद के सुरक्षित या प्रभावी होने की गारंटी नहीं है.

सरकारी एजेंसियों का सख्त रुख

बिना मेहनत और बिना परहेज के तेजी से वजन घटाने के दावे नए नहीं हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि पहले यह कारोबार अखबारों और टीवी तक सीमित था, अब सोशल मीडिया के जरिए सीधे यूजर के मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच गया है.

अगस्त 2025 में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने VLCC पर भ्रामक फैट-लॉस विज्ञापनों को लेकर 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था. यह मामला CoolSculpting प्रक्रिया से जुड़े विज्ञापनों का था, जिसमें अमेरिकी FDA की मंजूरी के दायरे को गलत तरीके से पेश किया गया था. इससे पहले इसी तरह के विज्ञापनों के लिए ‘Kaya’ पर भी 3 लाख रुपये का जुर्माना लगाया जा चुका है.

ग्लोबल मार्केट में भी शिकंजा

वजन घटाने वाले उत्पादों का यह विवाद सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है. ब्रिटेन की ‘एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी’ (ASA) ने फरवरी 2026 में डर्मल पैच के विज्ञापनों की जांच की और आवश्यक लाइसेंस न होने पर कई विज्ञापनों पर रोक लगाई. वहीं, अमरीका के ‘फेडरल ट्रेड कमीशन’ (FTC) ने भी ऐसी कंपनियों पर कार्रवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि त्वचा पर लगाए जाने वाले उत्पादों के वजन घटाने संबंधी दावों के लिए ठोस वैज्ञानिक प्रमाण अनिवार्य हैं.

उपभोक्ता क्या करें?

‘फैट बर्न’, ‘डिटॉक्स’, ‘मेटाबॉलिज्म बूस्ट’ और ‘गारंटीड वेट लॉस’ जैसे शब्द विज्ञापनों में जितने आकर्षक लगते हैं, उनके पीछे का सच उतना ही अलग हो सकता है. वजन घटाने के नाम पर कोई भी उत्पाद खरीदने से पहले सिर्फ उसकी कीमत न देखें, बल्कि यह परखें कि उत्पाद की श्रेणी क्या है, उसके दावे का क्लिनिकल प्रमाण क्या है और क्या वह नियामकीय मानकों (Regulatory Standards) पर खरा उतरता है.

क्योंकि इस लुभावने बाजार में अगर दावे सही साबित नहीं हुए, तो फैट कम हो या न हो, आपकी जेब जरूर हल्की हो जाएगी.

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