जमीयत उलेमा-ए-हिंद की वर्किंग कमेटी की दो दिवसीय महत्वपूर्ण बैठक का औपचारिक ऐलान कर दिया गया है. इस बैठक के एजेंडे को लेकर जारी एक बयान में संगठन ने देश के मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक हालात, सांप्रदायिकता (कम्युनलिज़्म), संवैधानिक संस्थाओं की कथित चुप्पी और नफरत पर आधारित राजनीति को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है. जमीयत ने साफ तौर पर कहा है कि देश का मुसलमान कभी किसी जुल्म या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है. उन्हें मोहब्बत से जीता जा सकता है, लेकिन जबरदस्ती या डरा-धमकाकर दबाया नहीं जा सकता.
डराने की राजनीति और सत्ता का खेल
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का आरोप है कि देश में नफरत की राजनीति अब खुले तौर पर डराने-धमकाने के खतरनाक दौर में पहुंच चुकी है. संगठन के मुताबिक, इसका एकमात्र मकसद अल्पसंख्यक समुदाय में खौफ पैदा करना और उन्हें थोपी गई शर्तों के तहत जीने के लिए मजबूर करना है.
बयान में कहा गया है कि केवल सत्ता हासिल करने के लिए देश की शांति, अखंडता और भाईचारे के साथ एक खतरनाक खेल खेला जा रहा है. हालिया चुनावों के बाद कुछ नेताओं में नफरत के जरिए सत्ता पाने का जुनून और ज्यादा बढ़ गया है. धार्मिक भावनाओं को भड़काकर बहुसंख्यक आबादी को अल्पसंख्यकों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, जबकि कानून और व्यवस्था के रखवाले मूकदर्शक बने हुए हैं. जमीयत ने याद दिलाया कि सरकारें हमेशा इंसाफ और निष्पक्षता के सिद्धांतों से चलती हैं, खौफ या धमकियों से नहीं.
भेदभाव का आरोप
बैठक के एजेंडे में पश्चिम बंगाल के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री के उस कथित बयान पर भी तीखी आपत्ति जताई गई है, जिसमें उन्होंने “सिर्फ हिंदुओं के लिए काम करने” की बात कही थी. जमीयत ने इसे पूरी तरह से असंवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ करार दिया है.
संगठन का कहना है कि हर मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ लेते समय सभी नागरिकों के साथ बिना किसी भेदभाव के इंसाफ करने का वादा करता है. सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों की यह जिम्मेदारी है कि वे हर नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करें, न कि किसी खास समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाकर बांटने वाली राजनीति को बढ़ावा दें.
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इस्लाम और नागरिक अधिकारों पर कथित प्रहार
जमीयत ने देश के मौजूदा वैचारिक बदलाव को एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा बताया है. संगठन के अनुसार, यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) को लागू करना, ‘वंदे मातरम’ को अनिवार्य बनाना, मस्जिदों-मदरसों के खिलाफ कार्रवाई और एसआईआर (SIR) की आड़ में वास्तविक नागरिकों को मताधिकार (वोटिंग राइट्स) से वंचित करना, ये सभी एक ही चेन की कड़ियां हैं.
बयान में यह भी कहा गया कि अतीत की सरकारों ने भी मुसलमानों को सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया, लेकिन आज के हालात कहीं ज्यादा चिंताजनक हैं. पहले केवल मुसलमानों को टारगेट किया जाता था, लेकिन अब सीधे इस्लाम और उसकी निशानियों को निशाना बनाया जा रहा है. साल 2014 के बाद बनाए गए कई कानून और नीतियां इसका साफ सबूत हैं. जमीयत ने वैश्विक स्तर पर भी इस्लाम के खिलाफ चल रहे संगठित दुष्प्रचार का जिक्र करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि इस्लाम को मिटाने की कोशिश करने वाले खुद खत्म हो गए, लेकिन इस्लाम हमेशा जिंदा रहा है और रहेगा.
एकजुटता की अपील
इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने देश की सभी इंसाफपसंद राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक संगठनों और देशभक्त नागरिकों से एक बड़ी अपील की है. संगठन ने आह्वान किया है कि देश में भाईचारे, सहनशीलता, सामाजिक न्याय और संविधान की सर्वोच्चता को अक्षुण्ण रखने के लिए सभी को लोकतांत्रिक और सामाजिक स्तर पर सांप्रदायिक व फासीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होना होगा. जमीयत ने स्पष्ट किया कि वह इन तमाम जनविरोधी और असंवैधानिक कदमों के खिलाफ अपनी कानूनी और लोकतांत्रिक लड़ाई पूरी मजबूती के साथ जारी रखेगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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