सुप्रीम कोर्ट ने 2007 के अजमेर शरीफ दरगाह ब्लास्ट मामले (Ajmer Sharif dargah blast case) में एक अंतरिम आदेश पारित किया है. कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में राजस्थान हाई कोर्ट से कहा है कि वह पीड़ित द्वारा दायर अपीलों पर देरी को नजरअंदाज करते हुए मामले को गुण-दोष के आधार पर फैसला करने को कहा है.
व्यापक हित पर भी करें विचार
जस्टिस एम. एम सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह अंतरिम निर्देश अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम और मामले की शिकायतकर्ता सैयद सरवर चिश्ती की ओर से दायर अपील पर सुनवाई के बाद दिया है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हाई कोर्ट अर्जी दायर किए जाने के बाद नए सिरे से सुनवाई कर इसका निपटारा करे. कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की संवेदनशीलता और पीड़ित के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट को अपीलों पर केवल तकनीकी आधार पर नहीं बल्कि न्याय के व्यापक हित पर विचार करना चाहिए.
देरी को माफ नहीं किया जा सकता: SC
राजस्थान हाई कोर्ट ने वर्ष 2022 में इन अपीलों को खारिज कर दिया था. हाई कोर्ट का कहना था कि अपील दाखिल करने में 90 दिनों से अधिक की देरी हुई है और एनआईए अधिनियम 2008 की धारा 21(5) के तहत इस देरी को माफ नहीं किया जा सकता है, भले ही मामला पांच साल तक लंबित रहा हो. जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की गई थी. जिसपर सुनवाई के बाद कोर्ट ने यह आदेश दिया है. 11 अक्टूबर 2007 को रमजान के दौरान इफ्तार पार्टी के तुरंत बाद विस्फोटक हो गया था, जिसमें तीन लोगों की मौत हो गई थी और कई घायल हो गए थे. इस मामले में लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद कुछ आरोपियों को कोर्ट ने बरी कर दिया था.
धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचाने की कोशिश
अभियोजन पक्ष के मुताबिक आरोपी ने दरगाह (Ajmer Sharif dargah) को निशाना बनाकर मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुचाने की कोशिश की. एनआईए ने 13 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल किया था, लेकिन मामले की सुनवाई के दौरान कई गवाह अपने पूर्व में दिए गए बयानों से मुकर गए, जिससे अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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