बिहार एसआईआर की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सभी पक्षों की जिरह के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह फैसला सुरक्षित रखा है. यह याचिका गैर सरकारी संगठन एडीआर सहित अन्य की ओर से दायर की गई है. 12 अगस्त 2025 को इस मामले में सुनवाई शुरू हुई थी. उस समय टिप्पणी करते हुए कहा था कि मतदाता सूची में नाम शामिल करना या हटाना भारतीय संविधान के तहत निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है.
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी, वरिष्ठ वकील गोपाल शंकर नारायण, प्रशांत भूषण सहित अन्य ने दलीलें रखी. वही चुनाव आयोग की तरफ से पूर्व एएसजी मनिंदर सिंह और राकेश द्विवेदी ने पक्ष रखा. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को बताया कि वोटर लिस्ट की नियमित रूप से एसआईआर की जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि केवल भारतीयों नागरिकों के नाम ही मतदाता सूची में हो.
1971 के बाद बदली आबादी की तस्वीर
वरिष्ठ वकील विजय हंसरिया ने कहा कि वोट देने का अधिकार सिर्फ नागरिकों को है. उन्होंने कहा कि देश में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी आए हैं. खासकर 1971 के बाद जिससे कई राज्यों की आबादी का संतुलन बदला है. उन्होंने कहा है कि आधार कार्ड सिर्फ पहचान का.दस्तावेज है, इससे नागरिकता साबित नहीं होती. कोई भी व्यक्ति जो भारत में रह रहा है, वह आधार बनवा सकता है. आधार न तो जन्मतिथि का पक्का सबूत है, न नागरिकता का और न ही स्थायी निवास का इसलिए एसआईआर के लिए आधार को मुख्य दस्तावेज नही माना जा सकता.
इसपर जस्टिस बागची ने कहा कि पासपोर्ट का काम भी निजी एजेंसियों के जरिए होता है, फिर भी उसे सरकारी दस्तावेज माना जाता है. उन्होंने कहा कि आधार पहचान का एक मान्य दस्तावेज है, हालांकि इससे नागरिकता साबित नहीं होती. चुनाव आयोग जरूरत पड़ने पर इसकी जांच कर सकता है.
चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप बेबुनियाद
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया है वोटर लिस्ट से नाम हटाने की कार्रवाई सभी पार्टियों के मतदाताओं पर हुई है, इसलिए चुनाव आयोग पर किसी पार्टी को फायदा पहुचाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता है. वही सिब्बल ने कहा कि चुनाव कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की है, इसपर कोई विवाद नहीं है. सवाल यह है कि वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और नियमो के अनुसार है. उन्होंने कहा कि नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है, न कि चुनाव आयोग के पास है.
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-भारत एक्सप्रेस
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